अक्सर सुनने में आता है कि हम इतनी पूजा करते है दान करते जी है लेकिन फिर भी परेशान है ।
कमाई बोहुत है पर घर मे लक्ष्मी नही रुकती,
किसी ना किसी सदस्य को बीमारी लगी ही रहती है,
कभी भी एक्सीडेंट हादसे आदि होते रहते है,
व्यापार में नुकसान रहता है,
नोकरी टिकती नही,
परिवार में कलह, झगड़े, विवाद होते रहते है,
बच्चे नही है और हे भी तो वो नालायक है,
सबका सार ये है कि घर, परिवार, मन मे सुख-शांति नही है ।
वैदिक मतानुसार
पहली बात किये गए दान का स्वम द्वारा किया गए बखान से दान का पुण्य क्षय हो जाता है ।
दूसरी बात यदि घर के कुलदेव या कुल देवी, पित्र नाराज या अप्रप्त है तो कोई भी पूजा दान सफल नही होता ।
तीसरी बात जिस घर मे बुजुर्ग, मातापिता, गुरु, इष्ट, साधु, कर्मकांडी ब्राह्मण और नारी का सम्मान नही वंहा से रिद्धि सिद्धि लक्ष्मी चली जाती है ।
चौथी बात अपने अधीनस्थ सेवको का अपमान भी दुख का कारण बनता है ।
पांचवी और अंतिम बात गाय या पाले हुए पशु पर अत्याचार या उनकी सेवा में कमी भी दरिद्रता लाती है ।
प्रेम, सम्मान, समर्पण,सेवा ही मानव जीवन का मूल मंत्र है ।
जिस घर के कुलदेव, पित्र, गुरु, इष्ट संतुष्ट होंगे उनके घर मे कोई भी बाधा, व्याधि नही आ सकती ।
प्रसन्न रहो, सबको प्रसन्न रखो तो रिद्धि सिद्धि, शांति और लक्ष्मी जी स्वम आपके घर का पता पूछ कर आएगी ।।
दुसरो का दिल दुखा कर भाई तू खुद कैसे कभी मुस्कुरा पायेगा ।
जो देगा वो ही वापस आएगा जैसे बीज बोयेगा फसल वही तू पायेगा ।।
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