अष्टभैरवों में धन, वैभव और ज्ञान के दाता – रुरु भैरव
भैरव को शिव का उग्र रूप माना गया है। वे केवल संहारक ही नहीं, बल्कि रक्षक और वरदानी भी हैं। अष्ट भैरवों में से द्वितीय स्थान पर माने जाते हैं “रुरु भैरव”।
रुरु भैरव कौन हैं?
रुरु भैरव का स्वरूप अत्यंत दिव्य है। उनका शरीर पीतवर्ण (पीला) है, वे हाथों में वीणा और दण्ड धारण करते हैं।
उनका वाहन सफेद घोड़ा है।
वे अत्यंत शांत, सौम्य और कल्याणकारी भैरव स्वरूप माने जाते हैं।
रुरु भैरव का वास कहाँ है?
शास्त्रों के अनुसार रुरु भैरव का निवास दक्षिण दिशा में बताया गया है।
काशी (वाराणसी) में इनका प्रमुख स्थान है, जहाँ भक्त विशेषकर धन और ज्ञान की प्राप्ति हेतु इनकी साधना करते हैं।
साधना के लाभ
धन, वैभव और अन्न–सम्पत्ति में वृद्धि
व्यापार में सफलता
शिक्षा, कला और संगीत में प्रगति
अज्ञान और दरिद्रता का नाश
समाज में मान–सम्मान और राजकीय अनुकंपा
इसलिए इन्हें “ज्ञान और धन के दाता” कहा जाता है।
किसने साधना की पहले?
तंत्र शास्त्रों और पुराणों में वर्णन आता है कि प्राचीन काल में कई राजाओं और सिद्ध योगियों ने रुरु भैरव की साधना करके धन और वैभव प्राप्त किया।
विशेषकर विद्याधर, कवि, संगीतज्ञ और तांत्रिक साधक इन्हें अपना आराध्य मानते थे।
मंत्र
रुरु भैरव को प्रसन्न करने हेतु एक सरल मंत्र है –
“ॐ रुरुभैरवाय नमः”
इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से धीरे-धीरे धन–सम्पत्ति और जीवन में स्थिरता आने लगती है।
निष्कर्ष
भैरव केवल विनाशक नहीं, बल्कि जीवन को समृद्ध बनाने वाले भी हैं।
जो व्यक्ति सच्चे मन से रुरु भैरव की साधना करता है, उसके जीवन में कभी अन्न–धन की कमी नहीं रहती।
आइए, हम सब मिलकर रुरु भैरव की शरण लें और अपने जीवन को धन, ज्ञान और वैभव से सम्पन्न करें।
जय भैरवनाथ 🚩
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