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Showing posts from 2025

श्री बटुकभैरव-अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

श्री बटुकभैरव-अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र  बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के पाठ से बाधाओं और शत्रुओं पर विजय, स्वास्थ्य और मानसिक शांति मिलती है, धन और समृद्धि बढ़ती है, और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह स्तोत्र बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और अकाल मृत्यु से भी बचाता है।  ॐ ह्रीं भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावन:| क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट् ||१|| श्मशानवासी मांसाशी खर्पराशी स्मरांतकः| रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धिसेवित ||२|| कंकालः कालशमनः कलाकाष्टातनु: कविः | त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिंगल-लोचनः ||३|| शूलपाणिः खङ्गपाणिः कंकाली धूम्रलोचनः| अभीरू: भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः ||४|| धनदो अधनहारी च धनवान् प्रतिभानवान्| नागहारो नागपाशो व्योमकेशः कपालभृत् ||५|| कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः| त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रः त्रिशिखी च त्रिलोकप: ||६|| त्रिनेत्र तनयो डिम्भशान्तः शान्तजनप्रियः| बटुको बहुवेशश्च खट्वांगवरधारकः ||७|| भूताध्यक्षः पशुपतिः भिक्षुकः परिचारकः| धूर्तो दिगम्बरः शूरो हरिणः पांडुलोचनः ||८|| प्रशांतः शांतिदः शुद्धः शंकर-प्रियबांधवः| अष्टमूर्तिः नि...

दिवाली पर करें मां अष्टलक्ष्मी को प्रसन्न

दिपावली के शुभ उपलक्ष्य पर प्रसन्न करें माँ अष्टलक्ष्मी को उनके विशेष स्तोत्र द्वारा  अष्ट लक्ष्मी रूप एवं स्तोत्र मंत्र माँ लक्ष्मी के 8 रूप माने जाते है।हर रूप विभिन्न कामनाओ को पूर्ण करने वाला है। दिवाली और हर शुक्रवार को माँ लक्ष्मी के इन सभी रूपों की वंदना करने से असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति होती है। १) आदि लक्ष्मी या महालक्ष्मी : माँ लक्ष्मी का सबसे पहला अवतार जो ऋषि भृगु की बेटी के रूप में है। मंत्र  सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवी चन्द्र सहोदरीहेममये | मुनिगणमंडित मोक्षप्रदायिनी मंजुलभाषिणीवेदनुते || पंकजवासिनी देवसुपुजित सद्रुणवर्षिणी शांतियुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी आदिलक्ष्मी सदापलीमाम || २) धन लक्ष्मी : धन और वैभव से परिपूर्ण करने वाली लक्ष्मी का एक रूप भगवान विष्णु भी एक बारे देवता कुबेर से धन उधार लिया जो समय पर वो चूका नहीं सके , तब धन लक्ष्मी ने ही विष्णु जी को कर्ज मुक्त करवाया था। मंत्र धिमिधिमी धिंधिमी धिंधिमी धिंधिमी दुन्दुभी नाद सुपूर्णमये | घूमघूम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते || वेदपूराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते | जय जय...

कमाई बोहुत है पर घर मे लक्ष्मी नही रुकती,

अक्सर सुनने में आता है कि हम इतनी पूजा करते है दान करते जी है लेकिन फिर भी परेशान है । कमाई बोहुत है पर घर मे लक्ष्मी नही रुकती, किसी ना किसी सदस्य को बीमारी लगी ही रहती है, कभी भी एक्सीडेंट हादसे आदि होते रहते है, व्यापार में नुकसान रहता है, नोकरी टिकती नही, परिवार में कलह, झगड़े, विवाद होते रहते है, बच्चे नही है और हे भी तो वो नालायक है, सबका सार ये है कि घर, परिवार, मन मे सुख-शांति नही है । वैदिक मतानुसार  पहली बात किये गए दान का स्वम द्वारा किया गए बखान से दान का पुण्य क्षय हो जाता है । दूसरी बात यदि घर के कुलदेव या कुल देवी, पित्र नाराज या अप्रप्त है तो कोई भी पूजा दान सफल नही होता । तीसरी बात जिस घर मे बुजुर्ग, मातापिता, गुरु, इष्ट, साधु, कर्मकांडी ब्राह्मण और नारी का सम्मान नही वंहा से रिद्धि सिद्धि लक्ष्मी चली जाती है । चौथी बात अपने अधीनस्थ सेवको का अपमान भी दुख का कारण बनता है । पांचवी और अंतिम बात गाय या पाले हुए पशु पर अत्याचार या उनकी सेवा में कमी भी दरिद्रता लाती है । प्रेम, सम्मान, समर्पण,सेवा ही मानव जीवन का मूल मंत्र है । जिस घर के कुलदेव, पित्र, गुरु, इष्ट संतुष्ट ...

दरिद्रता से मुक्ति हेतु श्री ग़ज़ लक्ष्मी साधना विधि विधान

गजलक्ष्मी – धन और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी गजलक्ष्मी माता, देवी लक्ष्मी का अति दिव्य और शक्तिशाली स्वरूप है। अष्टलक्ष्मी में गजलक्ष्मी का विशेष महत्व है। गज का अर्थ है हाथी और लक्ष्मी का अर्थ है धन-समृद्धि। हाथियों के संग विराजमान गजलक्ष्मी माता का स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि जहाँ इनकी कृपा होती है वहाँ जीवन में वर्षा समान बरकत, स्थिर धन और उन्नति बनी रहती है। समुद्र मंथन के समय प्रकट हुई लक्ष्मी के अवतारों में गजलक्ष्मी वह रूप हैं जो जीव को दरिद्रता से मुक्त कर ऐश्वर्य, मान-सम्मान और स्थायी सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। गजलक्ष्मी साधना के लाभ – व्यापार और नौकरी से जुड़ी अड़चनें दूर होती हैं – घर-परिवार से दरिद्रता का नाश होकर सुख-शांति आती है – धन का संचय और स्थिरता प्राप्त होती है – जीवन में आत्मविश्वास, आकर्षण और उन्नति बढ़ती है साधना में सावधानियाँ – साधना हमेशा पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता से करें – पूजा के समय क्रोध, नकारात्मक विचार या अपवित्रता साधना को निष्फल कर देती है – धन का दुरुपयोग या अहंकार देवी कृपा को दूर कर सकता है – शुक्रवार, पूर्णिमा या दीपावली की रात्...

श्री मां कामाख्या देवी जी की साधना

❤️ योनी साधना❤️ आजकल बहुत से लोग हमें फोन या मैसेज करके एक ही सवाल पूछते हैं – अगर हम अपनी पत्नी की योनि की पूजा करेंगे तो क्या हमें बड़ा लाभ मिलेगा? दोस्तों, यह सोच पूरी तरह गलत है और असली शक्ति साधना से बिल्कुल अलग है। इस प्रश्न का कारण है लोगों को मिला अधूरा ज्ञान। आजकल लोग गूगल, युटुब, फेसबुक के माध्यम से जुड़े होने से कहीं भी गलत पोस्ट पढ़ लेते हैं, ऊपर से जो फेसबुक पर बड़े-बड़े महात्मा बैठे हैं, pdf बेचने वाले बैठे हैं यह सब ज्ञानी लोग भोले भाले लोगों के मन में ऐसी बातें डाल देते हैं जो कि बिल्कुल गलत है असम का कामाख्या मंदिर एक महान शक्ति पीठ है। मान्यता है कि माता सती का योनि भाग वहीं विराजमान हुआ और इसी कारण यह शक्ति-पीठ विश्वप्रसिद्ध है। कामाख्या में होने वाली योनि पूजा किसी स्त्री शरीर की पूजा नहीं है, बल्कि आदिशक्ति के दिव्य स्वरूप की आराधना है। वहाँ की परंपरा शक्ति तत्त्व की साधना है, न कि किसी इंसान के शरीर की। लेकिन आज कई लोग इस परंपरा को गलत ढंग से समझकर अपनी पत्नी या किसी अन्य स्त्री की योनि पूजा करना चाहते हैं। यह न तो शास्त्रसम्मत है, न धर्मसम्मत और न ही शक्ति साधना ...

कृत्यानाशक_श्रीबगला_सूक्तम्

॥ #कृत्यानाशक_श्रीबगला_सूक्तम् ॥ (अथर्ववेद पंचमकाण्डे षष्टोऽनुवाक) अथ सूक्तम:- यां ते चक्रुरामे पात्रे यां चक्रुर्मिश्रधान्यके । आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥१॥ यां ते चक्रुः कृकवाका वजे वा यां कुरीरिणि । अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥२॥ यां ते चक्रुरेकशफे पशूनामुभयादति । गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥३॥ यां ते चक्रुरमूलायां वलगं वा नराच्याम् । क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥ ४ ॥ यां ते चक्रुगार्हिपत्ये पूर्वाग्नावुत दुश्चितः । शालायां कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥५॥ यां ते चक्रुः सभायां यां चक्रुरधिदेवते । अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥६॥ यां ते चक्रुः सेनायां यां चक्रुरिष्वायुधे । दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥७॥ यां ते कृत्यां कूपे वदधुः श्मशाने वा निचनुः । सद्यनि कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥८॥ यां ते चक्रुः पुरुषस्यास्थे अग्नौ संकसुके च याम् । म्रोकं निर्दाहं क्रव्यादं पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥९॥ अपथैनाज भारैणां तां पथेतः प्रहिण्मसि । अधीरो...

अष्टभैरवों में धन, वैभव और ज्ञान के दाता – रुरु भैरव

अष्टभैरवों में धन, वैभव और ज्ञान के दाता – रुरु भैरव  भैरव को शिव का उग्र रूप माना गया है। वे केवल संहारक ही नहीं, बल्कि रक्षक और वरदानी भी हैं। अष्ट भैरवों में से द्वितीय स्थान पर माने जाते हैं “रुरु भैरव”। रुरु भैरव कौन हैं? रुरु भैरव का स्वरूप अत्यंत दिव्य है। उनका शरीर पीतवर्ण (पीला) है, वे हाथों में वीणा और दण्ड धारण करते हैं। उनका वाहन सफेद घोड़ा है। वे अत्यंत शांत, सौम्य और कल्याणकारी भैरव स्वरूप माने जाते हैं। रुरु भैरव का वास कहाँ है? शास्त्रों के अनुसार रुरु भैरव का निवास दक्षिण दिशा में बताया गया है। काशी (वाराणसी) में इनका प्रमुख स्थान है, जहाँ भक्त विशेषकर धन और ज्ञान की प्राप्ति हेतु इनकी साधना करते हैं। साधना के लाभ धन, वैभव और अन्न–सम्पत्ति में वृद्धि व्यापार में सफलता शिक्षा, कला और संगीत में प्रगति अज्ञान और दरिद्रता का नाश समाज में मान–सम्मान और राजकीय अनुकंपा इसलिए इन्हें “ज्ञान और धन के दाता” कहा जाता है। किसने साधना की पहले? तंत्र शास्त्रों और पुराणों में वर्णन आता है कि प्राचीन काल में कई राजाओं और सिद्ध योगियों ने रुरु भैरव की साधना करके धन और वैभव प्राप्त क...

कृत्यानाशक_श्रीबगला_सूक्तम्

॥ #कृत्यानाशक_श्रीबगला_सूक्तम् ॥ (अथर्ववेद पंचमकाण्डे षष्टोऽनुवाक) अथ सूक्तम:- यां ते चक्रुरामे पात्रे यां चक्रुर्मिश्रधान्यके । आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥१॥ यां ते चक्रुः कृकवाका वजे वा यां कुरीरिणि । अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥२॥ यां ते चक्रुरेकशफे पशूनामुभयादति । गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥३॥ यां ते चक्रुरमूलायां वलगं वा नराच्याम् । क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥ ४ ॥ यां ते चक्रुगार्हिपत्ये पूर्वाग्नावुत दुश्चितः । शालायां कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥५॥ यां ते चक्रुः सभायां यां चक्रुरधिदेवते । अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥६॥ यां ते चक्रुः सेनायां यां चक्रुरिष्वायुधे । दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥७॥ यां ते कृत्यां कूपे वदधुः श्मशाने वा निचनुः । सद्यनि कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥८॥ यां ते चक्रुः पुरुषस्यास्थे अग्नौ संकसुके च याम् । म्रोकं निर्दाहं क्रव्यादं पुनः प्रतिहरामि ताम् ॥९॥ अपथैनाज भारैणां तां पथेतः प्रहिण्मसि । अधीरो...

श्री स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र विधान

#स्वर्णाकर्षणभैरवस्तोत्रनामावलिः।।                   (अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्र) ॐ अस्यश्रीस्वर्णाकर्षणभैरव स्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवदेवता ह्रीं बीजं क्लीं शक्तिः सः कीलकं मम दारिद्र्यनाशार्थे पाठ विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः - ब्रह्मर्षये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । स्वर्णाकर्षणभैरवाय नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । क्लीं शक्तये नमः पादयोः । सः कीलकाय नमः नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । ह्रां ह्रीं ह्रूं इति कर षडङ्गन्यासः ॥ अथ ध्यानम् - पारिजात द्रुम कान्तारे स्थिते माणिक्यमण्डपे । सिंहासन गतं वन्दे भैरवं स्वर्णदायकम् ॥ गाङ्गेयपात्रं डमरूं त्रिशूलं वरं करः सन्दधतं त्रिनेत्रं । देव्यायुतं तप्तस्वर्णवर्ण स्वर्णाकर्षणभैरवमाश्रयामि॥ मन्त्रः - ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं श्रीं आपदुद्धारणाय ह्रां ह्रीं ह्रूं अजामलवद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षणभैरवाय मम दारिद्र्यविद्वेषणाय महाभैरवाय नमः श्रीं ह्रीं ऐम् ॥ अथ नामावलिः । ॐ भैरवेशाय नमः । ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मने नमः । ॐ त्रैलोक्यवन्धाय नमः । ॐ वरदाय नमः । ...

श्री ललिता सहस्त्राचन शास्त्रोक्त शस्त्रसम्मत विधि विधान सहित

श्रीललिता सहस्त्रार्चन की अत्यंत सूक्ष्म विधि चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चके्र पंचाभिः। नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः॥ श्रीयंत्र का उल्लेख तंत्रराज, ललिता सहस्रनाम, कामकलाविलास , त्रिपुरोपनिषद आदि विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है । इन्हीं पुराणों में वर्णित भगवती महात्रिपुरसुन्दरी स्वयं कहती हैं- ‘श्री यंत्र मेरा प्राण, मेरी शक्ति, मेरी आत्मा तथा मेरा स्वरूप है। श्री यंत्र के प्रभाव से ही मैं पृथ्वी लोक पर वास करती हूं।’’ श्री यंत्र में २८१६ देवी देवताओं की सामूहिक अदृश्य शक्ति विद्यमान रहती है। इसीलिए इसे यंत्रराज, यंत्र शिरोमणि, षोडशी यंत्र व देवद्वार भी कहा गया है। ऋषि दत्तात्रेय व दूर्वासा ने श्रीयंत्र को मोक्षदाता माना है । जैन शास्त्रों ने भी इस यंत्र की प्रशंसा की है. जिस तरह शरीर व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं । यंत्र को देवता का शरीर और मंत्र को आत्मा कहते हैं। यंत्र और मंत्र दोनों की साधना उपासना मिलकर शीघ्र फलदेती है । जिस तरह मंत्र की शक्ति उस...

सर्व यन्त्र मन्त्र तंत्रोत्कीलन पाठ विधी

सर्व यन्त्र मन्त्र तंत्रोत्कीलन पर्वतीउवाच: देवेश परमानंद भक्तानांभयप्रद,आगमा निगमसचैव बीजं बीजोदयस्था।।१।। समुदायेंन बीजानां मंत्रो मंत्रस्य संहिता। ऋशिछ्दादिकम भेदो वैदिकं यामलादिकम।।२।। धर्मोअधर्मस्था ज्ञानं विज्ञानं च विकल्पनम। निर्विकल्प विभागेनं तथा छठकर्म सिद्धये।३।। भुक्ति मुक्ति प्रकारश्च सर्व प्राप्तं प्रसादत:। कीलणं सार्वमंत्रनां शंसयद ह्रदये वच :।।४।। इति श्रुत्वा शिवानाथ: पर्वत्या वचनम शुभम। उवाच परया प्रीत्या मंत्रोतकील्कन शिवाम।।५।। शिवोवाच। वरानने ही सर्वस्य व्यक्ताव्यक्ततस्य वस्तुनः। साक्षीभूय त्वमेवासि जगतस्तु मनोस्थता।।६।। त्वया पृष्ठटँ वरारोहे तद्व्यामुत्कीलनम। उद्दीपनम ही मन्त्रस्य सर्वस्योत्कीलन भवेत।७।। पूरा तव मया भद्रे स्मकर्षण वश्यजा। मंत्रणा कीलिता सिद्धि: शर्वे ते सप्तकोटिय:।।८।। तवानुग्रह प्रीतत्वातसिद्धिस्तेषां फलप्रदा। येनोपायेन भवति तं स्तोत्रं कथ्यामहम।।९।। श्रुणु भद्रेअत्र सतत मवाभ्याखिलं जगत। तस्य सिद्धिभवेतिष्ठ मया येषां प्रभावकम।।१०।। अन्नं पान्नं हि सौभाग्यं दत्तं तुभ्यं मया शिवे। संजीवन्नं च मन्त्रनां तथा दत्यूं परनर्ध्रुवं।।११।। यस्य स्मरण मात्रे...

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ।  अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जा कर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा - कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए। रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं - "लक्ष्मण! रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त...

मां बगलामुखी स्तंभन

मां बगलामुखी स्तंभन की देवी है।सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तरंग है वो इन्हीं की वजह से है।सारे ब्रह्माण्ड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती।शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद,कोर्ट केस  में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का स्तम्भन होता है तथा जातक का जीवन निष्कंटक हो जाता है। किसी छोटे कार्य के लिए हो या असाध्य से लगाने वाले कार्य के लिए इनका मंत्र अनुष्ठान करना चाहिए। बगलामुखी मंत्र के जप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। भगवती का स्वरुप नवयौवना हैं और पीले रंग की सा‌‌ङी धारण करती हैं । सोने के सिंहासन पर विराजती हैं । तीन नेत्र और चार हाथ हैं । सिर पर सोने का मुकुट है । स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत हैं । शरीर पतला और सुंदर है । रंग गोरा और स्वर्ण जैसी कांति है । सुमुखी हैं । मुख मंडल अत्यंत सुंदर है जिस पर मुस्कान छाई रहती है जो मन को मोह लेता है ।व्यष्ठि रूप में शत्रुओ को नष्ट करने की इच्छा रखने वाली तथा समिष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। पिताम्बराविद्या के नाम विख्यात बगलामुखी की साधना प्रायः शत्रुभय से मुक्ति और वाकसि...

।।गुरुमंत्र का प्रभाव।।

⚜️*।।गुरुमंत्र का प्रभाव।।*⚜️            .....'स्कन्द पुराण' के ब्रह्मोत्तर खण्ड में कथा आती हैः काशी नरेश की कन्या कलावती के साथ मथुरा के दाशार्ह नामक राजा का विवाह हुआ। विवाह के बाद राजा ने अपनी पत्नी को अपने पलंग पर बुलाया परंतु पत्नी ने इन्कार कर दिया। तब राजा ने बल-प्रयोग की धमकी दी। पत्नी ने कहाः "स्त्री के साथ संसार-व्यवहार करना हो तो बल-प्रयोग नहीं, स्नेह-प्रयोग करना चाहिए। नाथ ! मैं आपकी पत्नी हूँ, फिर भी आप मेरे साथ बल-प्रयोग करके संसार-व्यवहार न करें।" आखिर वह राजा था। पत्नी की बात सुनी-अनसुनी करके नजदीक गया। ज्यों ही उसने पत्नी का स्पर्श किया त्यों ही उसके शरीर में विद्युत जैसा करंट लगा। उसका स्पर्श करते ही राजा का अंग-अंग जलने लगा। वह दूर हटा और बोलाः "क्या बात है? तुम इतनी सुन्दर और कोमल हो फिर भी तुम्हारे शरीर के स्पर्श से मुझे जलन होने लगी?" पत्नीः "नाथ ! मैंने बाल्यकाल में दुर्वासा ऋषि से शिवमंत्र लिया था। वह जपने से मेरी सात्त्विक ऊर्जा का विकास हुआ है। जैसे, अँधेरी रात और दोपहर एक साथ नहीं रहते वैसे ही आपने शराब पीने वाली वेश्याओं के ...

श्री काली जगन्मंगल कवचम्

श्री काली जगन्मंगल कवचम् ।।श्री दक्षिणाकाली प्रसन्नोस्तु।। . श्री काली जगन्मंगल कवचम्  श्री भैरव्युवाच काली पूजा श्रुता नाथ भावाश्च विविधाः प्रभो ।  इदानीं श्रोतु मिच्छामि कवचं पूर्व सूचितम् ॥  त्वमेव शरणं नाथ त्राहि माम् दुःख संकटात् ।  सर्व दुःख प्रशमनं सर्व पाप प्रणाशनम् ॥  सर्व सिद्धि प्रदं पुण्यं कवचं परमाद्भुतम् ।  अतो वै श्रोतुमिच्छामि वद मे करुणानिधे ॥ भैरवउवाच रहस्यं श्रृणु वक्ष्यामि भैरवि प्राण वल्लभे ।  श्री जगन्मङ्गलं नाम कवचं मंत्र विग्रहम् ॥  पाठयित्वा धारयित्वा च त्रौलोक्यं मोहयेत्क्षणात् ।  नारायणोऽपि यद्धृत्वा नारी भूत्वा महेश्वरम् ॥  योगिनं क्षोभमनयत् यद्धृत्वा च रघूत्तमः।  वर तृप्तो जघानैव रावणादि निशाचरान् ॥  यस्य प्रसादादीशोऽहं ्रैलोक्य विजयी प्रभुः ।  धनाधिपः कुबेरोऽपि सुरेशोऽभूच्छचीपतिः ।  एवं हि सकला देवाः सर्वसिद्धिश्वराः प्रिये ॥ विनियोग:- ॐ श्री जगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य ऋषिः शिवः ।  छ्न्दोऽनुष्टुप् देवता च कालिका दक्षिणेरिता ॥  जगतां मोहने दुष्ट विजये भुक्तिमुक्तिषु ।  योषिदाकर...

त्रिदेवी ध्यानम्

1  माँ महाकाली ध्यानम्  खड्‌गं चक्र-गदेषु-चाप-परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिर: शंखं संदधतीं करौस्त्रिनयनां सर्वाड्गभूषावृताम्। नीलाश्म-द्युतिमास्य-पाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुंमधुं कैटभम्।। भावार्थ- भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने पर महा- बलवान् दैत्य मधु कैटभ के संहार-निमित्त पद्मयोनि-ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली देवी का मैं स्मरण करता हूँ। वे अपने दस भुजाओँ में क्रमशः खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ (फेंककर चलाया जाने वाला एक प्राचीन अस्त्र), शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। वह तीन नेत्रोँ से युक्त हैं और उनके संपूर्ण अंगों में दिव्य आभूषण पड़े हैं। नीलमणि के सदृश उनके शरीर की आभा है एवं वे दसमुखी तथा पादोँ वाली हैं। 2  माँ महालक्ष्मी ध्यानम्  ॐ अक्ष-स्रक्‌-परशुं गदेषु-कुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्। शूल पाश-सुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्।। भावार्थ- मैं कमलासन पर आसीन प्रसन्नवदना महिषासुरमर्दिनी भगवती श्रीमहालक्ष्मी ...