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॥ श्रीलक्ष्मीसूक्त ॥

                                                 
                                                             

                                                                      ॥ श्रीलक्ष्मीसूक्त ॥
             श्री गणेशाय नमः ।
ॐ पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥
पद्मानने पद्मऊरु पद्माश्री पद्मसम्भवे ।
तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥
अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने ।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥
पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्योधनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमस्तु मे ॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जापिनाम् ॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते ।
धान्य धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥
ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे महश्रियै च धीमहि ।
तन्नः श्रीः प्रचोदयात् ॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥
चन्द्रप्रभां लक्ष्मीमैशानीं सूर्याभांलक्ष्मीमैश्वरीम् ।
चन्द्र सूर्याग्निसङ्काशां श्रियं देवीमुपास्महे ॥
॥ इति श्रीलक्ष्मी सूक्तम् सम्पूर्णम् ॥

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