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विशेष कृपा एवं महान विपरीत परिसथितयों में ही प्रयोग करें




विशेष कृपा एवं महान विपरीत परिसथितयों में ही प्रयोग करें जीवन में आ रही किसी भी प्रकार की समस्यायो के निदान के लिए प्रतिदिन 11 वार सस्वर पाठ करे ( दशमहाविद्यास्तोत्रम्: ) ॐ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनि । नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि ॥१॥ शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे । प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥२॥ जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम् । करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥३॥ हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम् । गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालङ्कारभूषिताम् ॥४॥ हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम् । सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरङ्गणैर्युताम् ॥५॥ मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिङ्गशोभिताम् । प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥६॥ उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम् । नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम् ॥७॥ श्यामाङ्गीं श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम् । प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्वार्थसाधिनीम् ॥८॥ विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम् । आद्यामाद्यगुरोराद्यामाद्यनाथप्रपूजिताम् ॥९॥ श्रीं दुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम् । प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम् ॥१०॥ त्रिपुरां सुन्दरीं बालामबलागणभूषिताम् । शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम् ॥११॥ सुन्दरीं तारिणीं सर्वशिवागणविभूषिताम् । नारायणीं विष्णुपूज्यां ब्रह्मविष्णुहरप्रियाम् ॥१२॥ सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यां गुणवर्जिताम् । सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्वसिद्धिदाम् ॥१३॥ विद्यां सिद्धिप्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम् । महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम् ॥१४॥ प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम् । रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम् ॥१५॥ भैरवीं भुवनां देवीं लोलजिव्हां सुरेश्वरीम् । चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम् ॥१६॥ त्रिपुरेशीं विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम् । अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशिनीम् ॥१७॥ कमलां छिन्नभालाञ्च मातङ्गीं सुरसुन्दरीम् । षोडशीं विजयां भीमां धूमाञ्च वगलामुखीम् ॥१८॥ सर्वसिद्धिप्रदां सर्वविद्यामन्त्रविशोधिनीम् । प्रणमामि जगत्तारां साराञ्च मन्त्रसिद्धये ॥१९॥ इत्येवञ्च वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम् । पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनि ॥२०॥ इति दशमहाविद्यास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।। ।। महाकाली प्रसन्नोस्तु।।

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